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तमिलनाडु

तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर: हिसाब दर्ज करने वाला हज़ार साल पुराना मंदिर

राजराज चोल प्रथम का बनवाया, लगभग 1010 में पूरा हुआ मंदिर और उसकी दीवारों पर दर्ज हिसाब-किताब।

तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर।
तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर। चित्र: Nirinsanity, CC BY-SA 4.0

तंजावुर के विशाल मंदिर को चोल राजा राजराज प्रथम ने बनवाया। लगभग 985 से 1014 तक चले उनके शासन में, लगभग 1010 में मंदिर पूरा हुआ। उसके शिलालेख उसे राजराजेश्वरम, यानी राजराज के ईश्वर, कहते हैं। बृहदेश्वर नाम बाद में आया।

ग्रेनाइट का पहाड़

गर्भगृह के ऊपर का विमान लगभग 66 मीटर ऊँचा है और पूरा ग्रेनाइट का है। शिलालेखों में मुख्य शिल्पी का नाम भी दर्ज है: कुंजर मल्लन राजराज पेरुंतच्चन। हज़ार साल पहले के किसी शिल्पी का नाम बचा रहना अपने आप में दुर्लभ है।

मंदिर की दीवार पर राजराज चोल का तमिल शिलालेख।
मंदिर की दीवार पर राजराज चोल का तमिल शिलालेख। चित्र: Nittavinoda, CC BY-SA 4.0

पत्थर पर बहीखाता

मंदिर की दीवारें एक बड़ा बहीखाता हैं। गहने, दीपक, गाँवों का देय हिस्सा, क़र्ज़, सब कुछ खुदा है। राजराज की बड़ी बहन कुंदवै के दिए गहनों की सूची भी है। अखंड दीप के लिए घी देने को चरवाहों को पशु दान किए जाते थे, अक्सर 96 भेड़ें।

चार सौ नाम

मंदिर की सेवा में लगाई गई चार सौ महिलाओं के नाम, उन्हें दिए गए घर और हर एक का सालाना हिस्सा, 100 कलम धान, सब शिलालेखों में दर्ज है। 1891 से यूजेन हुल्त्श ने ‘साउथ इंडियन इंस्क्रिप्शंस’ शृंखला में इनके अनुवाद छापे।

यह कहानी मशहूर है कि गोपुरम की परछाईं ज़मीन पर नहीं पड़ती, पर परछाईं पड़ती है। यह बात मंदिर के रिकॉर्ड से नहीं आई।

आज भी राजराज के जन्म नक्षत्र सदयम के दिन तंजावुर में सदय उत्सव मनाया जाता है।

लगभग 66 मीटर ऊँचे विमान का शिखर।
लगभग 66 मीटर ऊँचे विमान का शिखर। चित्र: simianwolverine, CC BY 2.0

समयरेखा

  1. ~985राजराज चोल प्रथम गद्दी पर बैठे।
  2. ~1010राजराजेश्वरम मंदिर पूरा हुआ।
  3. 1014राजराज के शासन का अंत।
  4. 1891यूजेन हुल्त्श ने तंजावुर शिलालेखों के अनुवाद छापने शुरू किए।

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स्रोत

मूल स्रोत

  1. E. Hultzsch (ed.), South Indian Inscriptions, Vol. II: inscriptions of the Rajarajesvara temple at Tanjavur. Archaeological Survey of India, Madras, 1891–1913. मुफ़्त में पढ़ें

शोध और अध्ययन

  1. Leslie C. Orr, Donors, Devotees, and Daughters of God: Temple Women in Medieval Tamilnadu. Oxford University Press, New York, 2000.
  2. B. Venkataraman, Rajarajesvaram: The Pinnacle of Chola Art. Mudgala Trust, Madras, 1985.
  3. Vidya Dehejia, Art of the Imperial Cholas. Columbia University Press, New York, 1990.
  4. K. A. Nilakanta Sastri, Studies in Cola History and Administration. University of Madras, 1932. मुफ़्त में पढ़ें

आधिकारिक स्रोत

  1. UNESCO World Heritage Centre, Great Living Chola Temples, 1987, extended 2004. मुफ़्त में पढ़ें